झारखंड के पर्व-त्यौहार


झारखंड आदिवासी बहुल राज्य है। इसलिए यहां की संस्कृति में आदिम जीवन का रंग-गंध यहां के सभी पर्व-त्योहारों में बिखरा पड़ा है। हालांकि अंग्रेजी शासन के बाद से ही यहां बाहरी समुदायों की बढ़ती हुई भारी आबादी के कारण, हिन्दू, मुस्लिम एवं अन्य धर्मावलंबियों की सांस्कृतिक छटा भी देखने को मिलते हैं। फिर भी आदिवासी पर्व-त्योहारों की बात ही कुछ और है। आदिवासियों का सबसे बड़ा त्योहार सरहुल है जो मुख्यतः बसंतोत्सव है जो मार्च-अप्रैल महीने में मनाया जाता है। इसके अलावा कुछ प्रमुख अन्य त्योहार इस प्रकार हैं:-

टुसू :- टुसू पर्व झारखंड के आदिवासियों का सबसे महत्वपूर्ण पर्व है। यह जाड़ों में फसल कटने के बाद पौष के महीने में मनाया जाता है। टूसू का शाब्दिक अर्थ कुँवारी है। इस पर्व के इतिहास का कुछ खास ज्ञान नहीं है लेकिन इस पर्व में बहुत से कर्मकांड होते हैं और यह अत्यंत ही रंगीन और जीवन से परिपूर्ण त्यौहार है। मकर संक्राति के अवसर पर मनाये जाने वाले इस त्यौहार के दिना पूरा आदिवासी समुदाय अपने नाच-गानों और मनसा देवी तथा अन्य पारंपरिक देवी देवताओं की पूजा से माहौल को आनंद और भक्ति से परिपूर्ण कर देते हैं ।

पर्व बांदना परब :- बांदना परब कार्तिक अमावस के दिन मनाया जाने वाला एक पर्व है। यह पर्व मुख्यतः पशुओं को लाभ पहुँचाने के उद्देश्य से मनाया जाता है और इस दिन पशुओं की पुजा की जाती है। इस पर्व पर गाये जाने वाले गानों को ओहिरा कहा जाता है।

करमा :- करमा झारखण्ड एवं छत्तीसगढ के आदिवासियों का एक लोकनृत्य है।

मागे पर्ब

झारखंड के लोकनृत्य

पाइका छऊ, जदुर, नाचनी, नटुआ, अगनी, चौकारा, जामदा, घटवारी, मतहा

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